Tuesday, 27 December 2011

कमल हो तुम

                                          कमल हो तुम 
जब जब तेरी नादान हरकते देखती हूँ
खुद को यह सोच मना लेती हूँ
कि तेरा कोई दोष नहीं आखिर
कमल कीचड़ मे ही तो खिलता हे .






















तेरी हर अच्छाई उस कमल की  तरह
जो सिर्फ खुशबू और सुन्दरता देती ,
फिर भला मे कीचड़ पर पत्थर कैसे  मारूं
जानती हूँ कि कुछ छींटे तेरी और कुछ

मेरी तरफ भी आयेंगे .

3 comments:

  1. बहुत ही प्यारी रचना ,बधाई स्वीकारें...

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  2. कमल सा बनकर भी महकना सरल नहीं
    फिर भी खुशबू कभी महकना नहीं छोड़ता
    asb

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