Sunday, 22 May 2011

मैं आपहिज नहीं

अभी कुछ दिन पहले की बात है एक मित्र ने सवाल किया क़ि कहानियों को पढ़कर क्या फायदा ? सिर्फ कल्पना के धरातल पर लिखी कोई कहानी क्या प्रेरणा दे सकती है ? कहानी अपने आप मे ही एक बहुत अनूठा विषय है और एक अच्छी कहानी कब किसके लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाती है यह तो वही पाठक जानता है जो किसी कहानी मे छिपे सन्देश को समझ सके १९९४ मे रायपुर (मध्य प्रदेश ) के" देशबंधु " समाचार पत्र मे छपी मेरी एक कहानी " मै अपाहिज नहीं " पर आये कई पाठको के पत्र सिर्फ यही जताने मे कामयाब रहे क़ि कहानी किस तरह पाठक के अंतर्मन को छू सकती है और एक आशा क़ि किरण बन सकती है ? ब्लॉग के माध्यम से आज फिर उसी कहानी को यहाँ साँझा कर रही हूँ इस आशा के साथ क़ि मेरी कहानी क़ि नायिका अबंतिका कई लोगो की प्रेरणा बन सके
कहते हैं मन की शक्ति से बढ़ा कुछ भी नहीं और जिसका अपना मन काबू मे है उसके लिए कोई भी फैसला करना मुश्किल नहीं और आज ऐसा ही एक फैसला अबंतिका को भी लेना था एक तरफ उसका प्यार और दूसरी तरफ उसकी स्वाभिमान । पिछले दस वर्षो ने उसकी जिन्दगी को जो भी रंग दिखाए आज फिर एक एक कर उसकी आँखों के आगे घूम रहे थे । अचानक इतने वर्षो के बाद निलेश का फिर से प्रकट हो जाना और शादी का प्रस्ताव रखना उसके जख्मो को फिर से हरा कर रहा था ।
बात उन दिनों की जब वह कॉलेज मे पढ़ती थी .अपने ही सहपाठी निलेश से उसके विचार इतने मिल गए थे की दोनों ने मन मे ठान रखी थी कि पढ़ाई पूर्ण होने के पश्चात् विवाह जैसे पवित्र बंधन मे बंध जाएंगे । दोनों परिवारों को भी इसमे कोई आपति न थी । कुशाग्र बुद्दि कि अवंतिका ने शुरु से ही अपनी इच्छा जाहिर कर दी थी कि वह विवाह के पश्चात भी कॉलेज मे अपना अध्यापन कार्य जारी रखेगी । पढ़ा लिखा और सुलझा हुआ परिवार भले किसी को भी क्या आपति हो सकती थी ? उल्टा निलेश के परिवार को ख़ुशी ही थी कि बहु के आने से घर कि आय बढेगी और निलेश कि तीन बहनों कि विवाह पर भी कुछ मदद ही मिल सकेगी । कॉलेज पूरा होते ही निलेश को बैंक मे अच्छी नौकरी मिल गयी और अवंतिका को एक कॉलेज मे ही शिक्षा कार्य मिल गया । बस अब समय आ गया कि विवाह हो और गृहस्थी कि शुरुआत हो। एक सुखी परिवार , सुख सम्पनता और विचारो का तालमेल यही तो आमतौर पर हर किसी का सपना होता है ? खेर मेरी कहानी कि नायिका कि जिन्दगी कि कहानी यहाँ खत्म नहीं बल्कि शुरु होती है ।
कहते हैं कि इन्सान जिन्दगी के लिए चाहे लाख योजनाये बना ले पर होनी को बदलना उसके हाथ मे नहीं । कुछ बाते सिर्फ समय कि गर्त मे छिपी होती हैं और सिर्फ एक घटना जिन्दगी का सारा रुख मोड़ देती है । अवंतिका के साथ भी कुछ ऐसा ही होने वाला था इसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं कि थी .अभी सिर्फ एक हफ्ता ही तो हुआ था सगाई को और अगले महीने शादी । बस नौकरी से छुट्टी कि अर्जी देते हुए सिर्फ उसकी आँखों मे सुहाने सपने घूम रहे थे पर नहीं जानती थी कि अगले मोड़ पर ही दुर्घटना उसकी बाट जोह रही है .एक तेजी से आती कार ने कब उसके सपनो ही नहीं वरन जिन्दगी को भी रौंद दिया था .आँख खुली तो खुद को हॉस्पिटल मे पाया । जान तो बच गयी पर अब पहले जैसा कुछ भी नहीं था । दोनों पैर दुर्घटना कि भेंट चढ़ चुके थे । निलेश ने दिलासा के कुछ शब्द बोल उसके मन को दिलासा जरुर पहुंचाई पर शब्दों के मरहम कितना आराम देते यह समय को तय करना था। दो महीने भर हॉस्पिटल रहकर आखिर अब अवंतिका घर लौट रही थी । हाँ इस बीच धीरे -धीरे निलेश का उसे देखने आना बहुत कम हो गया था ।
समय किसी के लिए नहीं रुकता हाँ समय ही वो सबसे बड़ी ताकत है जिसके पास हर दर्द का इलाज होता है । अवंतिका चलने फिरने मे लाचार जरुर हो चुकी थी लेकिन मन मे इतना विश्वास जरुर था कि भले दुनिया मुह मोड़ ले लेकिन निलेश का परिवार उसकी ताकत बन उसे जीने का होसला देगा । समय तेजी से निकला जा रहा था परन्तु निलेश के परिवार कि तेरफ एक मौन पसरा हुआ था । आकिर अवंतिका के घर वालो ने ही इस चुप्पी को तोडा और निलेश से विवाह कि बात पर कुछ निर्णय कि बाट पूछी । जिसे निलेश बड़ी चतुरता से टाळ गया ।
फिर कुछ दिन बाद मानो निलेश सिर्फ अवंतिका कि जिन्दगी मे गाज गिराने के लिए ही आया ।
निलेश के चंद शब्दों ने उसे बिलकुल तोड़ कर रख दिया । एक अपाहिज के साथ मे अपना जीवन यापन करना बहुत मुश्किल है अवंतिका ... मेरे उपर पहले ही परिवार का बोझ कम नहीं है .. अब तुम्हारा बोझ भी उठा सकूँ इतनी मुझमे शक्ति नहीं । मैने सोचा था कि हम दोनों मिलकर परिवार कि जिम्मेदारी निभायेंगे किन्तु आब मुझे नहीं लगता कि हम एक दूसरे कि ताकत बन सकतें हैं...निलेश बोलता जा रहा था और अवंतिका मौन हो सब सुन रही थी । कुछ भी कहने सुनने कि अब सायद कोई जरुरत ही नहीं रह गयी थी । सिर झुकाए निलेश तो वापस चला गया पैर अवंतिका को अपाहिज होने का अहसास कराके । रोने से समय का पहिया रुक जाये या फिर सब मुश्किले हल हो जाएँ तो इन्सान सिर्फ रो कर ही तृप्ति कर लेता । अवंतिका ने तय कर लिया कि वो किसी पर बोझ नहीं बनेगी बल्कि आगे कि पढ़ाई करके सारा जीवन अध्यापन कार्य मे बिता देगी ।
समय तेज गति से भागता रहा .अवंतिका की इच्छा शक्ति रंग लायी । एक कॉलेज मे उसे प्रोफेसर नियुक्त कर दिया गया । कृतिम पावों की मदद से उसके रोजमर्रा के कामो मे ठीक ठाक मदद मिलने लगी । इसी बीच पता चला था कि निलेश ने भी किसी सहकर्मी से विवाह कर लिया था ।
अब अवंतिका कि जिन्दगी उसका कॉलेज और घर ..अकसर निलेश के कहे शब्द अपाहिज .बोझ उसके कानो मे गूंजने लगते और उसको अपने अपूर्ण होने का अहसास करने से बाज न आते थे । समय के साथ जो इन्सान यूँ आंखे फेर ले ..वो जिन्दगी मे नहीं आया यही सोच कर वह अपने मन को मजबूत कर लेती । समय हर घाव को भर चला था .पिछले कई दिन से अवंतिका के मन मे विचार उठ रहे थे कि किस तेरह से वह अपनी जिन्दगी के खालीपन को भरकर कुछ अलग कर दिखाए ।
लेकिन आज इतने वर्षो के बाद अचनक निलेश के प्रकट होने से उसकी जिन्दगी मे हलचल मच गयी । उससे विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस निलेश ने उसे कभी बोझ समझ कर टुकरा दिया था वह आज उसके समक्ष लाचार खड़ा हो विवाह का प्रस्ताव रख रहा है । दरअसल प्रसब के दोरान अपनी पत्नी के निधन के बाद अब उसे अवंतिका की याद आई थी । उसे कहीं न कहीं यकीन था कि अवंतिका उसके प्रस्ताव को कभी इंकार नहीं करेगी । लेकिन वक्त के साथ रंग बदल लेने वाले गिरगिट को पहचान लेने कि समझ अब अवंतिका मे खूब आ गयी थी ।
कुछ सोचने का समय मांग उसने निलेश को चलता कर दिया था और अब एक फेसला लेने का अंतिम समय आ गया था । अचनक फ़ोन कि घंटी सुन उसने खुद को वर्तमान मे पाया । कल आ रही हूँ ऐसा कह कर उसने फ़ोन का रिसीवर नीचे रख दिया । अब उसके इरादे चट्टान कि तरह मजबूत हो चुके थे । बस आज का दिन ओर कल उसकी जिन्दगी को अर्थ मिल जायेगा । आखिर अवन्तिका ने फैसला कर लिया था कि वह कल ही उन दो बच्चो को घर ले आयगी जिन्हे दुनिया अपाहिज के नाम से सिर्फ बोझ होने का अहसास दिलती हे । अपने सपने को वो चुन चुकी थी इस उम्मीद के साथ कि खुद शारीरिक रूप से अपूर्ण होने के बाद भी वह किसी का सहारा दे उन्हे पढ़ा लिखा समाज मे जीने लायक बनाएगी ।
अवंतिका ने सिद्ध कर दिया कि शरीर की अपंगता कभी इन्सान के मजबूत इरादो को नहीं हरा सकती बल्कि वो काम तक करा देती है जिसे कोई सामान्य इन्सान भी आसानी से नहीं कर सकता । दो अनाथ और शारीरिक रूप से अपंग बच्चो को गोद लेकर कम से कम अवंतिका ने एक कभी न भूलने वाला उदाहरण प्रस्तुत किया है । नायिका अवंतिका का यह निर्णय इन शब्दों को सच करने मे पूरा सफल रहा हे की" मै अपाहिज नहीं "
और अब कुछ बातें पाठको से । आपको कैसी लगी यह कहानी ? अपनी राय से अवगत कराएँ । आशा हे कहानी पाठको को कुछ सन्देश देने मै सफल होगी ?

7 comments:

  1. SABSE pahle to naye blog ki badhai Abha !!"मै अपाहिज नहीं"....bahut sundar kahani aur Aaj ki Nari ko sasakt banane ki prerna deti bhawpurn rachna !!sundar !!

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  2. saroj sakhi hosla barhney key liye bahut bahut dhanyabadh . shivani ki kehaniyo ki tereh hi may bhi apni her kehani ki nayika ko swabhimani hi rekhti hun. asha hay sakhi ki srahana meri kalam key penepan ko aur teji degi?

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  3. "मैं अपाहिज हूँ" मैं सब खूबियाँ हैं जैसे आकर्षक शीर्षक, प्रेरक सन्देश और कथानक जो एक कहानी में होनी चाहिए - सशक्त रचना, मैं देर से पढ़ पाया - बधाई और शुभ आशीष

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  4. शरीर की अपंगता कभी इन्सान के मजबूत इरादो को नहीं हरा सकती बल्कि वो काम तक करा देती है जिसे कोई सामान्य इन्सान भी आसानी से नहीं कर सकता ।
    बहुत अच्छी कहानी है … प्रभावित करती है आपकी लेखनी !

    आभार और बधाई स्वीकार करें सुमन जी

    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  5. bahut sunder .....hardik badhaayi suman ji

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